बिलीरुबिन क्या है? इसके प्रकार और शरीर में इसकी भूमिका
- 22 Sep, 2025
- Written by Team Dr Lal PathLabs
Medically Approved by Dr. Shuchi
Table of Contents

बिलीरुबिन (bilirubin in hindi) हमारे शरीर स्थित वो पदार्थ है जो पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं से टूटने पर बनता है। बिलीरुबिन दरअसल पीला और नारंगी रंग का सबस्टेंस यानी पदार्थ है जो लिवर के जरिए प्रोसेस होकर शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। हमारे शरीर में समय समय पर लाल रक्त कोशिकाओं खुद टूटने लगती है। इन टूटी हुई कोशिकाओं के हीमोग्लोबिन से बिलीरुबिन बनता है। खून के माध्यम से बिलीरुबिन (bilirubin in hindi) लिवर तक पहुंचता है और लिवर इसे संसाधित करके शरीर के बाहर निकालने की प्रक्रिया करता है। इस प्रक्रिया के बाद ये पदार्थ पित्त के जरिए पाचन तंत्र तक पहुंचता है और फिर मल और मूत्र के जरिए शरीर के बाहर निकाल दिया जाता है। बिलीरुबिन का स्तर शरीर के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इसका बढ़ा हुआ स्तर लिवर की कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। अगर शरीर में बिलीरुबिन (bilirubin in hindi) का स्तर बढ़ जाए तो व्यक्ति जॉन्डिस यानी पीलिया का शिकार हो जाता है। जब लिवर क्षतिग्रस्त होता है या सही से काम नहीं कर पाता तो बिलीरुबिन को प्रोसेस करने की दर कम हो जाती है और शरीर में बिलीरुबिन (bilirubin in hindi) का स्तर बढ़ने लगता है। ये स्थिति कई गंभीर समस्याओं को जन्म दे सकती है। ऐसे में जरूरी है कि बिलीरुबिन का शरीर में स्तर सही बना रहे। इस लेख में जानते हैं कि बिलीरुबिन क्या होता है और बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है। साथ ही जानेंगे एक स्वस्थ शरीर में बिलीरुबिन टोटल कितना होना चाहिए।
बिलीरुबिन क्या होता है?
बिलीरुबिन शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने पर हीमोग्लोबिन से बनने वाला एक सब्सटेंस यानी पदार्थ है जो लिवर के जरिए संशोधित होकर पाचन तंत्र में जाता है और बाद में स्टूल और यूरिन के जरिए बाहर निकल जाता है। शरीर में इस पदार्थ का स्तर बढ़ने लिवर संबंधी दिक्कतें जैसे पीलिया आदि का खतरा बढ़ जाता है। अगर लिवर की कार्यक्षता कमजोर हो रही है या फिर लाल रक्त कोशिकाएं के टूटने की दर बढ़ रही है तो बिलीरुबिन (bilirubin in hindi) का स्तर शरीर में बढ़ जाता है। बिलीरुबिन दो प्रकार का होता है — अनकंजुकेडेट बिलीरुबिन (बिलीरुबिन indirect) और कंजुगेटेड बिलीरुबिन (बिलीरुबिन direct क्या है)। बिलीरुबिन direct लिवर के जरिए संसाधित होता है और ये पानी में घुलनशील होता है। प्रोसेस होने के बाद इसे पित्त के जरिए शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। वहीं बिलीरुबिन इनडायरेक्ट लिवर द्वारा संसाधित नहीं किया जाने वाले सबस्टेंस है जो पानी में घुलनशील नहीं होता है।
बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है?
बिलीरुबिन (bilirubin in hindi) का बढ़ना लिवर से जुड़ी कई स्थितियों की तरफ इशारा करता है। बिलीरुबिन कई कारणों से बढ़ (बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है) सकता है जो इस प्रकार हैं –
- लिवर संबंधी बीमारियां – लिवर संबंधी दिक्कतें जैसे हेपेटाइटिस, लिवर सिरोसिस, लिवर में सूजन या लिवर कैंसर लिवर की बिलीरुबिन को संसाधित करने की ताकत कम कर देती हैं जिससे शरीर में इस पदार्थ का स्तर बढ़ (बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है) जाता है।
- हीमोलिटिक एनीमिया– हीमोलिटिक एनीमिया वो कंडीशन है जिसमें शरीर में लाल रक्त कोशिकाएं सामान्य से ज्यादा तेजी से टूटने लगती है। जब ज्यादा कोशिकाएं टूटती हैं तो ज्यादा बिलीरुबिन बनता है और इसका शरीर के खून में स्तर बढ़ जाता है।
- जेनेटिक डिस्ऑर्डर – कई जेनेटिक डिस्ऑर्डर जैसे गिल्बर्ट सिंड्रोम आदि लिवर के बिलीरुबिन संसाधित करने की क्षमता पर बुरा असर डालते हैं।
- पित्त नली में विकार – पित्त की नली में रुकावट जैसे ट्यूमर, पथरी या फिर पित्त की नली में सूजन आने पर बिलीरुबिन पर्याप्त मात्रा में शरीर से बाहर नहीं निकल पाता। इससे शरीर के खून में इसका स्तर बढ़ने (बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है) लगता है।
- प्रेग्नेंसी रिलेटेड इंट्राहेपेटिक कोलेटेसिस – ये ऐसी मेडिकल कंडीशन प्रेग्नेंसी की आखिरी तिमाही में होती है जो लिवर की क्षमता पर असर डालती है। हालांकि ये स्थिति अस्थायी यानी टेंपरेरी होती है।
- नवजात बच्चों में – नवजात शिशुओं में कम विकसित लिवर के चलते बिलीरुबिन का स्तर बढ़ता (बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है) है। इसके अलावा ब्रेस्ट फीडिंग में दिक्कत या मां के दूध में कुछ पदार्थों के कारण बिलीरुबिन का स्तर बढ़ जाता है जिससे नवजात शिशु अक्सर पीलिया का शिकार हो जाते हैं।
- दवाएं – कुछ खास दवाएं भी शरीर में इस पदार्थ का स्तर बढ़ा सकती हैं।
शरीर में बिलीरुबिन टोटल कितना होना चाहिए?
स्वस्थ शरीर और स्वस्थ लिवर के लिए शरीर में बिलीरुबिन टोटल की सीमा सामान्य रेंज में होनी जरूरी है। वयस्कों में बिलीरुबिन का स्तर 1.2 से 1.3 मिलीग्राम प्रति डेसीलीटर (mg/dL) सामान्य माना जाता है। अगर किसी व्यक्ति में इस सीमा से ज्यादा बिलीरुबिन होता है तो लिवर से संबंधित दिक्कत या पित्त में पथरी का संकेत मिलता है। शरीर में बिलीरुबिन का स्तर अगर 1.2 to 1.3 mg/dL से ज्यादा ऊपर जाता है तो लिवर रोग के साथ साथ एनीमिया, पथरी, पीलिया आदि दिक्कतों के संकेत मिलते हैं।
बिलीरुबिन टेस्ट किस तरह किया जाता है?
बिलीरुबिन (बिलीरुबिन टेस्ट) के स्तर की जांच के लिए ब्लड टेस्ट और यूरिन टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट में शरीर में कुल बिलीरुबिन को मापा जाता है। अगर शरीर में बिलीरुबिन का स्तर ज्यादा मिलता है तो डॉक्टर आगे की जांच के लिए लिवर फंक्शन टेस्ट की सलाह देते हैं।
बिलीरुबिन शरीर में बनने वाला ऐसा पदार्थ है जिसका बढ़ना लिवर संबंधी दिक्कतों का कारण बन सकता है। ऐसे में बिलीरुबिन बढ़ने के लक्षणों की समय रहते पहचान करके इसकी जांच और मैनेजमैंट काफी महत्वपूर्ण साबित होते हैं। अगर किसी व्यक्ति में बिलीरुबिन बढ़ने के लक्षण दिख रहे हैं तो डॉक्टरी परामर्श लेना चाहिए। डॉक्टरी परामर्श के बाद बिलीरुबिन टेस्ट के लिए डॉ. लाल पैथलैब्स में शैड्यूल बुक करें। शैड्यूल बुक करने के लिए ड डॉ. लाल पैथलैब्स का ऐप डाउनलोड करें।
FAQ
1.बिलीरुबिन बढ़ने के लक्षण क्या हैं?
शरीर में बिलीरुबिन का स्तर बढ़ने पर त्वचा और आंखों का रंग पीला पड़ने लगता है। मरीज का मल यानी स्टूल गहरे रंग का होता है। इसके अलावा कमजोरी, थकान, भूख न लगना, त्वचा में खुजली होना और पेट में दर्द बना रहना भी बिलीरुबिन बढ़ने के लक्षण हैं।
2.बिलीरुबिन क्यों बढ़ता है?
लिवर के काम करने की क्षमता कमजोर होने पर, लाल रक्त कोशिकाओं के ज्यादा तेजी से टूटने पर, पित्त की नली में रुकावट, प्रेग्नेंसी के दौरान बिलीरुबिन का स्तर बढ़ जाता है।







