डायलिसिस – डायलिसिस के प्रकार, इसके काम करने का तरीका औऱ साइड इफेक्ट
- 27 Mar, 2025
- Written by Team Dr Lal PathLabs
Medically Approved by Dr. Seema
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किसी भी व्यक्ति के सेहतमंद रहने के लिए शरीर में किडनी की सही से काम करना काफी जरूरी माना जात है। किडनी के खराब (kidney failure) होने पर शरीर में कई गंभीर जटिलताएं पैदा हो जाती है। ऐसे में डायलिसिस (Dialysis) प्रोसेस का सहारा लिया जाता है। डायलिसिस जीवन की रक्षा के लिए इस्तेमाल होने वाला ऐसा प्रोसीजर है किडनी खराब होने पर खून से टॉक्सिन को बाहर निकालने का काम करता है।
जब किडनी खून से अपशिष्ट औऱ विषाक्त पदार्थो को शरीर से बाहर निकालने में नाकाम हो जाती है या फेल हो जाती है तो डायलिसिस उसकी भूमिका संभाल लेता है और किडनी वाला काम करता है। इससे किडनी द्वारा किए जा रहे काम पूरे होते हैं और शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। किडनी फेल होने पर अगर डायलिसिस न किया जाए तो शरीर में कई गंभीर असर हो सकते हैं जैसे फ्लुइड का ओवरलोड, शरीर में पोटेशियम का स्तर बढ़ जाना और मेटाबॉलिज्म इम्बैलेंस आदि। चलिए इस लेख में जानते हैं कि डायलिसिस क्या है, इसके कितने प्रकार होते हैं। इसके साथ साथ इसकी प्रोसेस और इसके संभावित साइड इफेक्ट के बारे में जानेंगे।
डायलिसिस क्या है? (What is Dialysis?)
डायलिसिस को जीवन रक्षक ऐसा उपचार कहा जाता है जो किडनी खराब होने या फेल होने की स्थिति में किडनी के कामकाज को संभाल लेता है। जब किडनी सही से काम नहीं कर पाती है तो शरीर में कई तरह के टॉक्सिन और तरल पदार्थ एकत्र होने लगते हैं। ऐसे में डाइलाइजर मशीन के जरिए एक छेदनुमा आर्टिफिशियल झिल्ली की मदद से खून में जमा इन टॉक्सिन और तरल पदार्थों को खून से अलग करके शरीर से बाहर निकाला जाता है। इस झिल्ली की मदद से खून साफ हो जाता है और वापस शरीर में आ जाता है।
डायलिसिस कितने प्रकार का होता है ? (What Are the Types of Dialysis?)
डाइलिसिस मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है।
- हेमोडायलिसिस (Haemodialysis)- इस डायलिसिस में खून को साफ करने के लिए डायलाइजर नाम की मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रोसेस में खून को शरीर से बाहर निकाल कर डायलिसिस मशीन के जरिए फिल्टर किया जाता है और फिर साफ करके वापस शरीर में भेजा जाता है। इस प्रोसेस के तहत कैथेटर का प्रयोग होता है। इस प्रोसेस को अस्पताल में कुशल डॉक्टरों की देख रेख में किया जाता है।
- पेरिटोनियल डायलिसिस (Peritoneal Dialysis) – इस तरह के डायलिसिस में शरीर के अंदर ही खून को साफ करने की प्रोसेस की जाती है। इस प्रोसेस के तहत पेट के अंदर की पतली परत खून को साफ करने के लिए नेचुरल फिल्टर का काम करने लगती है। पेरिटोनियल डायलिसिस घर पर भी किया जाता है और इसके लिए कुशल हेल्थ प्रोफेशनल की जरूरत नहीं पड़ती है।
डायलिसिस कैसे काम करता है? (How Does Dialysis Work?)
डायलिसिस अपने दोनों ही प्रकारों के जरिए अलग अलग तरह से काम करता है।
- हेमोडायलिसिस में खून को एक नस से जुड़ी ट्यूब यानी कैथेटर (catheter)से जरिए बाहर खींचा जाता है। इसके बाद इस खून को डायलाइजर (dialyser) नामक मशीन के जरिए फिल्टर किया जाता है। इसके बाद उसी ट्यूब के जरिए साफ खून को शरीर में वापस भेज दिया जाता है। ये प्रोसेस शरीर के केमिकल संतुलन को कायम रखते हुए हानिकार और विषाक्त पदार्थों और एक्स्ट्रा फ्लुइड को बाहर निकाल देती है।
- वहीं दूसरी तरफ पेरिटोनियल डायलिसिस में पेट की एक परत को ही नेचुरल फिल्टर के रूप में इस्तेमाल करके खून की सफाई की जाती है। इस प्रोसेस में कैथेटर को पेट में डाला जाता है और इसके जरिए डायलेसेट (dialysate) यानी एक क्लींजिंग फ्लइड को पेट की पतली परत तक पहुंचाया जाता है। डायलेसेट नाम का ये फ्लुइड सॉल्यूशन खून में जमा सभी तरह के टॉक्सिन, हानिकारक पदार्थों औऱ एक्स्ट्रा फ्लुइड को खींचकर बाहर निकाल देता है।
डायलिसिस करने की प्रोसेस क्या है ? (What is the Procedure for Dialysis?)
डायलिसिस करने की प्रोसेस इस प्रकार है –
1. हेमोडायलिसिस
- सबसे पहले एक प्रशिक्षित नर्स या टैक्नीशियन मरीज की नस में एक नीडिल यानी सुई इंजेक्ट करता है। ये नीडिल आमतौर पर मरीज की बांह में इंजेक्ट की जाती है।
- इस नीडिल के जरिए शरीर से खून निकाला जाता है।
- इस खून को डायलाइजर मशीन में भेजा जाता है।
- डायलाइजर टॉक्सिक और हानिकारक पदार्थों और एक्स्ट्रा फ्लुइड को खून से फिल्टर कर देता है।
- फिल्टर किया गया साफ खून उसी नीडिल की मदद से वापस शरीर में भेजा जाता है।
2. पेरिटोनियल डायलिसिस
- सबसे पहले एक सर्जन द्वारा मरीज के शरीर में कैथेटर डाला जाता है।
- डायलेटेस नामक क्लींजिंग फ्लुइड को इस कैथेटर में डाला जाता है। कैथेटर के जरिए ये फ्लुइड पेट की एक परत में जाता है।
- पेट की ये परत नेचुरल फिल्टर के तौर पर काम करती है और खून में जमा टॉक्सिक और हानिकारक पदार्थों और एक्स्ट्रा फ्लुइड द्वार अब्जॉर्व कर लिए जाते हैं।
- कुछ घंटों बाद इसी डायलेसेट क्लींजिंग फ्लुइड को कैथेटर के जरिए बाहर निकाल लिया जाता है।
डायलिसिस के साइड इफेक्ट क्या हो सकते हैं? (What Are the Side Effects of Dialysis?)
हालांकि डायलिसिस को किडनी फेलियर के मैनेजमेंट के लिए बहुत महत्वपूर्ण और जरूरी कहा जाता है लेकिन इसके कुछ साइड इफेक्ट भी हो सकते हैं। इसके साइड इफेक्ट इस प्रकार हैं –
- लो ब्लड प्रेशर – हेमोडायलिसिस में शरीर का खून बाहर निकालने की प्रोसेस के दौरान मरीज का ब्लड प्रेशर लो हो सकता है। इस दौरान मरीज को बीपी लो होने के कारण चक्कर आना या बेहोशी छाना आम है।
- थकान हावी होना – हेमोडायलिसिस सेशन के बाद अक्सर मरीज थकान महसूस करते हैं। दरअसल इस सेशन के दौरान शरीर टॉक्सिन को फिल्टर करने के लिए खुद को ढाल लेता है। इसलिए मरीज को थकान महसूस होती है।
- इंफेक्शन – हेमोडायलिसिस के बाद कैथेटर लगाने की जगह पर इंफेक्शन होने का रिस्क बढ़ जाता है। खासकर पेरोटोनियल डायलिसिस के दौरान कैथेटर वाली जगह पर संक्रमण का ज्यादा खतरा होता है।
- मांसपेशियों में ऐंठन – डायलिसिस प्रोसेस में फ्लुइड को बाहर निकालने के दौरान इलेक्ट्रोलाइट का इम्बैलेंस हो जाता है जिसके चलते मांसपेशियों में ऐंठन की परेशानी हो सकती है।
देखा जाए तो डायलिसिस किडनी फेलियर का सामना करने वाले मरीजों के लिए एक जीवन रक्षक प्रक्रिया है। किडनी के काम न करने की स्थिति में सही डायलिसिस प्रोसेस का चुनाव उस वक्त हेल्थ कंडीशन, मरीज की लाइफस्टाइल और डॉक्टर की सलाह पर डिपेंड करता है। किडनी डायलिसिस के लिए डॉ। लाल पैथलेब्स में टेस्ट बुक करवाएं। ध्यान रहे टेस्ट बुक करने से पहले डॉक्टरी परामर्श जरूरी है।
FAQs
1. डायलिसिस पर एक व्यक्ति कितने समय तक जीवित रह सकता है।
अगर मरीज हेल्दी डाइट ले, संतुलित लाइफस्टाइल अपनाए और सही उपचार ले तो डायलिसिस पर वो सालों तक जीवित रह सकता है।
2. क्या डायलिसिस के दौरान दर्द होता है
हालांकि डायलिसिस प्रोसेस दर्दनाक नहीं होती है लेकिन नीडिल लगाने के दौरान दर्द होता है और इस दौरान पेट फूलने से दिक्कत हो सकती है।








