प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए? जानिए सही समय और कारण
- 23 Nov, 2025
- Written by Team Dr Lal PathLabs
Medically Approved by Dr. Seema
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प्रेगनेंसी यानी गर्भावस्था किसी भी महिला के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। ये वो समय होता है जब मां के पेट में बच्चा विकास करता है। मां के पेट में पल रहे शिशु के विकास की निगरानी करने के लिए प्रेगनेंसी में कई तरह के टेस्ट किए जाते हैं। इन्हीं में से एक है सोनोग्राफी टेस्ट (pregnancy me sonography kab kab hoti hai)। सोनोग्राफी जिसे अल्ट्रासाउंड भी कहा जाता है, ऐसी मेडिकल इमेजिंग तकनीक है जो गर्भाशय में पल रहे शिशु के विकास और संभावित बीमारियों का पता लगाने के लिए की जाती है। प्रेगनेंसी के दौरान गर्भस्थ शिशु के डेवलपमेंट, उम्र, संपूर्ण स्वास्थ्य और संभावित बीमारियों या जेनेटिक असामान्यताओं का पता लगाने के लिए सोनोग्राफी एक बेहतरीन इमेजिंग तकनीक साबित मानी जाती है। सोनोग्राफी एक दर्दरहित और सुरक्षित मेडिकल टेस्ट प्रोसेस है जो हाई फ्रीक्वेंसी साऊंड वेव्स की मदद से गर्भाशय की रीयल टाइम तस्वीरें बनाती है। इसके अलावा सोनोग्राफी की मदद से ही महिला की संभावित डिलीवरी यानी प्रसव के समय भी अनुमान लगाया जा सकता है। देखा जाए तो प्रेगनेंसी के पूरे समयकाल में कई बार सोनोग्राफी (pregnancy me sonography kab kab hoti hai)करवाई जाती है। इस लेख में जानते हैं कि सोनोग्राफी क्या होता है और प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए। इसके साथ साथ जानेंगे सोनोग्राफी कैसे होता है।
सोनोग्राफी क्या होता है?
सोनोग्राफी एक नॉन इनवेसिव यानी बिना चीर फाड़ वाला दर्दरहित मेडिकल इमेजिंग टेस्ट है जिसमें हाई फ्रीक्वेंसी साउंड वेव्स की मदद से गर्भाशय में पल रहे भ्रूण की रियल टाइम तस्वीरें ली जाती हैं। इसके साथ साथ इस टेस्ट की मदद से शिशु के सभी अंगों के बारे में भी जानकारी मिलती है। सोनोग्राफी प्रेगनेंसी को कंफर्म करने के साथ साथ संभावित प्रसव का समय भी बताने में मददगार साबित होता है। इस तकनीक की मदद से पेट में पल रहे शिशू का विकास, उसके ह्रदय की गति का भी पता चलता है। इसकी मदद से एक से ज्यादा भ्रूण, शिशु के वजन, शारीरिक संरचना, बच्चे की पोजिशन, उसके चारों और फ्लुइड की मात्रा और उसके अंगों में किसी भी प्रकार की बीमारी या असामान्यता का पता आसानी से लगाया जा सकता है। सोनोग्राफी के जरिए डॉक्टर ये देखते हैं कि प्लेसेंटा सही जगह पर है या नहीं और इसके साथ साथ ये भी देखा जाता है कि शिशु सही तरीके से विकास कर रहा है या नहीं। सोनोग्राफी प्रेगेनेंसी (प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए) में काफी सुरक्षित टेस्ट है क्योंकि इसमें एक्सरे जैसी हानिकारक किरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
सोनोग्राफी कितने प्रकार का होता है?
सोनोग्राफी कई प्रकारों में किया जाता है। इसके प्रकार इस तरह हैं
- डॉपलर अल्ट्रासाउंड – इस टेस्ट में शिशु के खून के फ्लो और उसके दिल की धड़कन को मापा जाता है।
- 3D/4D अल्ट्रासाउंड – इस टेस्ट में शिशु की रियल टाइम मूवमेंट और उसके चेहरे की थ्री डायमेंशनल तस्वीरें निकाली जाती हैं।
- अब्डॉमिनल अल्ट्रासाउंड – ये प्रेगनेंसी का सबसे आम और तरीका है। इसमें पेट पर जेल लगाकर बच्चे की गतिविधियों को देखा जाता है।
- ट्रांसवेजाइनल अल्ट्रासाउंड – ये टेस्ट प्रेगनेंसी की शुरूआत में किया जाता है। इसमें एक पतली नली वेजाइना यानी योनि के अंदर भेजी जाती है जिससे अंदर की तस्वीरें मिलती हैं।
- एनटी स्कैन – शिशु की संभावित क्रोमोसोमल असामान्यताओं की जांच के लिए ये स्कैन किया जाता है।
प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब कब होती है?
एक नॉर्मल प्रेगनेंसी में कई बार (pregnancy me sonography kab kab hoti hai) सोनोग्राफी करवाने की जरूरत पड़ती है। सामान्यतया प्रेगनेंसी के अलग अलग चरणों में कुल तीन से चार बार सोनोग्राफी (pregnancy me sonography kab kab hoti hai) की जाती है। प्रेगनेंसी के अलग अलग चरण (प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए) में इस तरह सोनोग्राफी की जाती है।
- पहली सोनोग्राफी – पहली सोनोग्राफी प्रेगनेंसी के पहले 6 से 10 हफ्तों के बीच (pregnancy me sonography kab kab hoti hai) की जाती है। इसका मकसद बच्चे की पोजिशन, हार्ट रेट की जांच करना है। यही सोनोग्राफी प्रेगनेंसी को कंफर्म करती है और प्रसव की संभावित डेट की जानकारी देती है।
- दूसरी सोनोग्राफी – दूसरी सोनोग्राफी 11 से 14 हफ्तों (प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए) के बीच की जाती है। इस सोनोग्राफी में बच्चे में जन्मजात बीमारियों जैसे डाउन सिंड्रोम का पता लगाया जाता है। इसके साथ साथ इस दौरान बच्चे की गर्दन के पीछे फ्लुइड की मात्रा और मोटाई का भी पता लगाया जाता है।
- तीसरी सोनोग्राफी – ये अल्ट्रासाउंड 18 से 24 हफ्ते के भीतर होता है। इस दौरान बच्चे का जेंडर यानी लिंग का पता चलता है और उसके सभी अंगों की डिटेल जानकारी मिलती है। इस सोनोग्राफी में बच्चे की शारीरिक संरचना और संभावित असामान्यताओं का पता मिलता है जिससे संभावित जन्मजात विकृति के बारे में जानकारी मिलती है।
- चौथी सोनोग्राफी – चौथी सोनोग्राफी प्रेगनेंसी के 28 से 32वें हफ्ते के बीच की जाती है। इस टेस्ट में बच्चे के पूरे शारीरिक डेवलपमेंट और वजन को मापा जाता है। इस सोनोग्राफी में प्लेसेंटा की पोजिशन को चैक किया जाता है। इसके अलावा इस दौरान बच्चे के आस पास तरल पदार्थ यानी एमनियोटिक फ्लइड के स्तर की भी जांच की जाती है।
आपको बता दें कि अगर प्रेगनेंसी में कोई रिस्क है या कोई जटिलता है तो डॉक्टर प्रेगनेंसी के 23 और 24वें हफ्ते (प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए) में फेटल इकोकार्डियोग्राफी (pregnancy me sonography kab kab hoti hai)की सलाह दे सकते हैं। ये सोनोग्राफी मधुमेह वाली प्रेगनेंट महिलाओं को कराने की सलाह दी जाती है।
सोनोग्राफी कैसे होता है?
प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी दो प्रकार से की जाती है। एक ट्रांसअब्डॉमिनल यानी पेट के ऊपर और दूसरी ट्रांस वैजाइनल (TVS) यानी योनि के अंदर।
- ट्रांसअब्डॉमिनल सोनोग्राफी – इस प्रक्रिया में डॉक्टर पेट के ऊपर एक खास जेल लगाते हैं। इसके बाद एक छड़ी जैसी डिवाइस जिसे ट्रांसड्यूसर प्रोब कहते हैं, उसे पेट पर फिराया जाता है। इस डिवाइस से निकलने वाली तरंगे शरीर से टकराकर वापस आता हैं औऱ कंप्यटूर इन तरंगों को तस्वीरों में बदलता है।
- ट्रांसवेजाइनल सोनोग्राफी – इस प्रक्रिया लुब्रिकेंट यानी चिकनाई लगाकर एक ट्रांसड्यूसर (अल्ट्रासाउंड करने वाली प्रोब) को वेजाइना के अंदर भेजा जाता है। इसके जरिए गर्भस्थ शिशु के दिल की धड़कन और प्रेगनेंसी के समय का पता लगाया जाता है।
सोनोग्राफी की प्रक्रिया कुछ 15 मिनट से आधा घंटे तक हो सकती है। सोनोग्राफी के बाद शरीर से जेल को पोंछ कर साफ कर दिया जाता है।
सोनोग्राफी प्रेगनेंसी में बहुत ही महत्वपूर्ण टेस्ट कहा जाता है। इसकी मदद से गर्भस्थ शिशु के विकास और संभावित जटिलताओं का पता लगता है। डॉ. लाल पैथलैब्स में सुरक्षित औऱ सटीक सोनोग्राफी बुक करने के लिए शैड्यूल बुक करें। शैड्यूल बुक करने के लिए डॉ. लाल पैथलैब्स का ऐप डाउनलोड करें।
FAQ
प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी कब करवानी चाहिए
प्रेगनेंसी में सोनोग्राफी सामान्य तौर पर चार बार (pregnancy me sonography kab kab hoti hai) करवानी चाहिए। लेकिन अगर प्रेगनेंसी में जटिलताएं हैं या फिर महिला को डायबिटीज है तो डॉक्टर की सलाह पर अतिरिक्त सोनोग्राफी करवाई जा सकती है।
सोनोग्राफी की प्रक्रिया क्या है
सोनोग्राफी बहुत ही सुरक्षित और दर्दरहित प्रोसेस के तहत होती है। इसमें दो तरीके अपनाए जाते हैं, ट्रांसअब्डॉमिनल सोनोग्राफी और ट्रांसवैजाइना सोनोग्राफी। ट्रांसअब्डॉमिनल सोनोग्राफी में पेट पर जेल लगाकर ट्रांसड्यूसर से तस्वीरें ली जाती हैं। जबकि ट्रांसवेजाइनल सोनोग्राफी में ट्रांसड्यूसर को लुब्रिकेंट लगाकर वेजाइना के अंदर भेजा जाता है।






